अनार्य
अनार्य
- अनार्य का प्रयोग प्रजातीय और नैतिक दोनों अर्थो में होता है अर्थात वह व्यक्ति जो आर्य प्रजाति का न हो, अनार्य कहलाता है। आर्येतर अर्थात् किरात (मंगोल), हब्शी (नीग्रो), सामी, हामी, आग्नेय (ऑस्ट्रिक) आदि किसी मानव प्रजाति का व्यक्ति।
- ऐसे प्रदेश को भी अनार्य कहते हैं जहाँ आर्य न बसते हों, इसलिए म्लेच्छ को भी कभी-कभी अनार्य कहा जाता है।
- अनार्य प्रजाति की भाँति अनार्य भाषा, अनार्य धर्मअथवा अनार्य संस्कृति का प्रयोग भी मिलता है।
- नैतिक अर्थ में अनार्य का प्रयोग असामान्य, ग्राम्य, नीच, आर्य के लिए अयोग्य, अनार्य के लिए ही अनुरूप आदि के अर्थ में होता है।[1]
टीका टिप्पणी और संदर्भ
- ↑ पांडेय, राजबली “खण्ड 1”, हिन्दी विश्वकोश, 1973 (हिन्दी), भारतडिस्कवरी पुस्तकालय: नागरी प्रचारिणी सभा वाराणसी, पृष्ठ सं 115-116।
किरात भारत की एक प्राचीन अनार्य(संभवत: मंगोल) जाति थी, जिसका निवास-स्थान मुख्यत: पूर्वी हिमालय के पर्वतीय प्रदेश में था। प्राचीन संस्कृत साहित्य में किरातों का संबंध पहाड़ों और गुफ़ाओं से जोड़ा गया है और उनकी मुख्य जीविका आखेट बताई गई है। यजुर्वेद तथा अथर्ववेद में किरातों का पर्वत और कन्दराओं का निवासी बताया गया है। 'वाजसनेयीसंहिता' [1] और 'तैत्तिरीय ब्राह्मण' में किरातों का संबंध गुहा से बताया गया है- 'गुहाभ्य: किरातम'।
- वाल्मीकि रामायण में किरात नारियों के तीखे जूड़ों का वर्णन है और उनका शरीर वर्ण सोने के समान वर्णित है-
'किरातास्तीक्षणचूडाश्च हेमाभा: प्रियदर्शना: किष्किधाकांड'[2]
- महाभारत में किरातों के विषय में अनेक निर्देश मिलते हैं, जिनसे ज्ञात होता है कि उनकी गिनती बर्बर या अनार्य जातियों में की जाती थी-
'उग्राश्च भीमकर्माणस्तुषारायवना: खसा:, आंध्रकाश्च पुलिंदाश्च किराताश्चोग्रविक्रमा:। म्लेच्छाश्च पार्वतीयाश्च, कर्ण'[3]
- महाभारत, सभापर्व[4] में प्राग्ज्योतिषपुर(वर्तमान असम) के निकट अर्जुन की किरातों के साथ हुई लड़ाई का वर्णन है। महाभारत, सभापर्व के अंतगर्त उपायन उपपर्व में युधिष्ठिर के पास भेंट में किरात लोगों द्वारा लाए गए उपहारों का वर्णन है।[5] इसी प्रसंग में किरातों को फल-मूलभोजी, चर्मवस्त्रधारी, भयानक शस्त्र चलाने वाले और क्रूरकर्मा बताया गया है।
- संस्कृत काव्य में किरातों का सबसे सुंदर वर्णन शायद महाकवि कालिदासने किया है-
'भागीरथी निर्झरसीकराणं बोढा मुहु: कंपित देवदारु:। युद्वायुरन्विष्टमृगै: किरातैरासेव्यते भिन्नशिखंडिबर्ह:[6]
यहाँ हिमालय पर्वत पर गंगा के निर्झरों से सिक्त, देवदारुवृक्षों को बार-बार कंपायमान करने वाली और मयूरों के पंखों के भार को अस्त-व्यस्त कर देने वाली वायु का (कस्तूरी?) मृगों की खोज में घूमने वाले किरात सेवन करते हैं। रघु ने हिमालय प्रदेश की विजय के पश्चात् जब वहाँ से अपनी सेना का पड़ाव उठा लिया, तब उस स्थान के वन्य किरातों ने रघु की सेना के हाथियोंकी ऊँचाई का अनुमान उनके गले की रस्सों की रगड़ से देवदारु वृक्षों के तनों पर उत्कीर्ण रेखाओं से किया।[7]
ऐसा जान पड़ता है, कालांतर में किरात लोग अपने मूल निवास हिमालय से अतिरिक्त भारत के अन्य भागों में भी फैल गए थे। साँची (मध्य प्रदेश) के स्तूप पर किसी किरात भिक्षु के दान का उल्लेख है और दक्षिण भारत में नागार्जुनीकोंड के एक अभिलेख में भी किरातों का वर्णन हुआ है। महाभारत में उपाययनपर्व के उपर्युक्त निर्देश में किरातों की भेंट में चंदन की भी गणना की गई है, जिससे यह प्रतीत होता है कि कुछ किरातों की बस्तियाँ उस समय मैसूर आदि के समीपवर्ती प्रदेश में भी रही होगी। 'मनुस्मृति' में कई अन्य अनार्यजातियों के समान किरातों की भी व्रात्य क्षत्रियों में गणना की गई है- 'पारदा: पह्लवाश्चीना: किराता दरदा: खशा:।[8] यह भी संभव है कि किरात शब्द का प्रयोग वन्य जातियों के लिए साधारणत: होने लगा हो। सिक्किम के पश्चिम स्थित मोरग में आज भी किरात नामक एक जाति बसती है। संभवत: किरातों का मूल निवास स्थान यहीं रहा होगा।
टीका टिप्पणी और संदर्भ
- ↑ वाजसनेयीसंहिता(30, 16)
- ↑ किष्किधाकांड, 40।27
- ↑ कर्णपर्व, 73,19-20
- ↑ अध्याय 26
- ↑ सभापर्व 52, 9-12
- ↑ कु. सं., 1, 15
- ↑ रघुवंश 4, 76
- ↑ 'मनुस्मृति' (10, 43-44)
मंगोल
मंगोल छोटी आँख, पीली चमड़ी वाली एक जाति, जिसके दाढ़ी-मूँछ बहुत कम होती है। मंगोल लोग प्राय: खानाबदोश थे। ये खानाबदोश मर्द और औरतें बड़े मज़बूत कद-काठी के लोग थे। शहरी जन-जीवन इन्हें रास नहीं आता था। चंगेज़ ख़ाँ जैसा वीर, प्रतापी और महान् नेता मंगोल इतिहास में शायद ही हुआ है। बाबर ने अपने वंश को भारतमें मुग़ल प्रसिद्ध किया था। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि मुग़ल, मंगोलों के ही वंशज थे।
मज़बूत क़द-काठी
मंगोलों को कष्ट झेलने की आदत थी और ये लोग उत्तरी एशिया के लम्बे चौड़े मैदानों में तम्बुओं में रहते थे। लेकिन इनका शारीरिक बल और कष्ट झेलने का मुहावरा इनके ज़्यादा काम न आते, अगर इन्होंने एक सरदार न पैदा किया होता, जो बड़ा अनोखा व्यक्ति था। शहरों और शहरों के रंग-ढंग से भी उन्हें नफ़रत थी। बहुत से लोग समझते हैं कि चूंकि वे खानाबदोश थे, इसलिए जंगली रहे होंगे। लेकिन यह ख्याल ग़लत है। शहर की बहुत सी कलाओं का उन्हें अलबत्ता ज्ञान नहीं था, लेकिन उन्होंने ज़िन्दगी का अपना एक अलग तरीक़ा ढाल लिया था और उनका संगठन बहुत ही गुंथा हुआ था।
मंगोल
मंगोल छोटी आँख, पीली चमड़ी वाली एक जाति, जिसके दाढ़ी-मूँछ बहुत कम होती है। मंगोल लोग प्राय: खानाबदोश थे। ये खानाबदोश मर्द और औरतें बड़े मज़बूत कद-काठी के लोग थे। शहरी जन-जीवन इन्हें रास नहीं आता था। चंगेज़ ख़ाँ जैसा वीर, प्रतापी और महान् नेता मंगोल इतिहास में शायद ही हुआ है। बाबर ने अपने वंश को भारतमें मुग़ल प्रसिद्ध किया था। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि मुग़ल, मंगोलों के ही वंशज थे।
मज़बूत क़द-काठी
मंगोलों को कष्ट झेलने की आदत थी और ये लोग उत्तरी एशिया के लम्बे चौड़े मैदानों में तम्बुओं में रहते थे। लेकिन इनका शारीरिक बल और कष्ट झेलने का मुहावरा इनके ज़्यादा काम न आते, अगर इन्होंने एक सरदार न पैदा किया होता, जो बड़ा अनोखा व्यक्ति था। शहरों और शहरों के रंग-ढंग से भी उन्हें नफ़रत थी। बहुत से लोग समझते हैं कि चूंकि वे खानाबदोश थे, इसलिए जंगली रहे होंगे। लेकिन यह ख्याल ग़लत है। शहर की बहुत सी कलाओं का उन्हें अलबत्ता ज्ञान नहीं था, लेकिन उन्होंने ज़िन्दगी का अपना एक अलग तरीक़ा ढाल लिया था और उनका संगठन बहुत ही गुंथा हुआ था।
इतिहास
मंगोलों के कई समूह विविध समयों में भारत में आये और उनमें से कुछ यहीं पर बस गए। चंगेज़ ख़ाँ, जिसके भारत पर आक्रमण करने का ख़तरा 1211 ई. में उत्पन्न हो गया था, वह एक मंगोल था। इसी प्रकार से तैमूर भी, जिसने भारत पर 1398 ई. में हमला किया, वह भी एक मंगोल था। चंगेज ख़ाँ और उसके अनुयायी मुसलमान नहीं थे, किन्तु तैमूर और उसके अनुयायी मुसलमान हो गए थे। 'मंगोल लोग ही मुसलमान बनने के बाद 'मुग़ल' कहलाने लगे।' 1211 ई. में चंगेज ख़ाँ तो सिन्धु नदी से वापस लौट गया, किन्तु उसके बाद मंगोलों ने और कई आक्रमण भारत पर किए। दिल्ली के बलबन और अलाउद्दीन ख़िलजी जैसे शक्तिशाली सुल्तानों को भी मंगोलों का आक्रमण रोकने में एड़ी-चोट का पसीना एक कर देना पड़ा। 1398 ई. में तैमूर के हमले ने दिल्ली सल्तनत की नींवें हिला दीं और मुग़ल वंश की स्थापना का मार्ग प्रशस्त कर दिया, जिसने अठारहवीं शताब्दी में ब्रिटिश शासन की स्थापना होने तक इस देश में राज्य किया।
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