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अनंगपाल तोमर

अनंगपाल तोमर

दिल्ली के राजा

अनंगपाल तोमर तोमर वंश के एक राजा थे, जिन्होंने भारतमें हरियाणा और दिल्ली के क्षेत्रों पर शासन किया था।[1][2]

अनंगपाल के बारे में बहुत कम जानकारी है, जिनके पूर्वज सहस्राब्दी शताब्दी के अंत में मुुस्लिम सुल्तान के दमन के कारण अरावली पहाड़ियों के क्षेत्र मेेवात में बस गए थे। अभिलेखो मे सालेरिया ब्रदर का उल्लेख मिलता हे सालेरिया काकुराणा ने अरावली मेे घासेडा को अपनी राजधानी बनाया! अनंगपाल की जानकारी के लिए प्राथमिक स्रोत पृथ्वीराज रासो से आता है, पृथ्वीराज चौहान का इतिहास जो बहुत बाद में लिखा गया था। कुछ सूत्रों का कहना है कि लाल कोट में भौतिक साक्ष्य (शाब्दिक रूप से लाल किला, वर्तमान लाल किले से भ्रमित न हो), जिसके बारे में लगता है कि उन्होनें इसका निर्माण करवाया था और जो इस क्षेत्र का सबसे पुराना पहचान योग्य शहर है, यह बताता है कि वह ग्यारहवीं शताब्दी रहते थे लेकिन अन्य लोग बताते हैं कि यह 8 वीं शताब्दी थी।[3] एतिहासिक पुस्तकों ने अनंगपाल तोमर को गुर्जर के रूप में वर्णित किया। गुुुर्जर और जाट जैसे अन्य समुदायों ने भी अनंगपाल को अपना पूर्वज होने का दावा किया है।[4]

इन्हें भी देखेंसंपादित करें

संदर्भसंपादित करें

  1.  Mukherji, Anisha Shekhar (2003). The Red Fort of Shahjahanabad (अंग्रेज़ी में). Oxford University Press. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-19-565775-3. मूल से 27 मार्च 2019 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 18 मई 2020.
  2.  Blake, Stephen P. (2002-04-30). Shahjahanabad: The Sovereign City in Mughal India 1639-1739 (अंग्रेज़ी में). Cambridge University Press. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-521-52299-1.
  3.  Singh, Khushwant (2001). City Improbable: An Anthology of Writings on Delhi (अंग्रेज़ी में). Viking.
  4.  Khari, Rahul (2007). Jats and Gujars: Origin, History and Culture (अंग्रेज़ी में). Reference Press. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-8405-031-8.
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तोमर वंश

भारतीय गोत्र

तोमरतंवर या कुंतल उत्तर पश्चिम भारत का एक गोत्र है जो जाट[1][2]गुर्जर[3] और राजपूत[4] जातियों में पाया जाता है। इन्होंने वर्तमान दिल्ली की स्थापना दिहिलिका के नाम से की थी।[5]

परिचय 

पुराणों से प्रतीत होता है कि आरंभ में तोमरों का निवास हिमालय के निकटस्थ किसी उत्तरी प्रदेश में था। किंतु १०वीं शताब्दी तक ये करनाल तक पहुँच चुके थे। थानेश्वर में भी इनका राज्य था। उस समय उत्तर भारत में चौहान राजवन्श का साम्राज्य था। उन्हीं के सामंत के रूप में तंवरों ने दक्षिण की ओर अग्रसर होना आरम्भ किया।[कृपया उद्धरण जोड़ें]

दिल्ली में उनके अधिकार का समय अनिश्चित है। किंतु विक्रम की १०वीं और ११वीं शतियों में हमें साँभर के चौहानों और तोमरों के संघर्ष का उल्लेख मिलता है। तोमरेश रुद्र चौहान राजा चंदन के हाथों मारा गया। तंत्रपाल तोमर चौहान वाक्पति से पराजित हुआ। वाक्पति के पुत्र सिंहराज ने तोमरेश सलवण का वध किया। किंतु चौहान सिंहराज भी कुछ समय के बाद मारा गया। बहुत संभव है कि सिंहराज की मृत्यु में तोमरों का कुछ हाथ रहा हो। ऐसा प्रतीत होता है कि तोमर इस समय दिल्ली के स्वामी बन चुके थे। गज़नवी वंश के आरंभिक आक्रमणों के समय दिल्ली-थानेश्वर का तोमर वंश पर्याप्त समुन्नत अवस्था में था।[कृपया उद्धरण जोड़ें]

तोमरराज ने थानेश्वर को महमूद से बचाने का प्रयत्न भी किया, यद्यपि उसे सफलता न मिली। सन् १०३८ ईo (संo १०९५) महमूद के पुत्र मसूद ने हांसी पर अधिकार कर लिया। मसूद के पुत्र मजदूद ने थानेश्वर को हस्तगत किया। दिल्ली पर आक्रमण की तैयारी होने लगी। ऐसा प्रतीत होता था कि मुसलमान दिल्ली राज्य की समाप्ति किए बिना चैन न लेंगे। किंतु तोमरों ने साहस से काम लिया। तोमरराज महीपाल ने केवल हांसी और थानेश्वर के दुर्ग ही हस्तगत न किए; उसकी वीर वाहिनी ने काँगड़े पर भी अपनी विजयध्वजा कुछ समय के लिये फहरा दी। लाहौर भी तँवरों के हाथों से भाग्यवशात् ही बच गया।[कृपया उद्धरण जोड़ें]

तोमरों की इस विजय से केवल विद्वेषाग्नि ही भड़की। तोमरों पर इधर उधर से आक्रमण होने लगे। तँवरों ने इनका यथाशक्ति उत्तर दिया। संवत् ११८९ (सन् ११३२) में रचित श्रीधर कवि के पार्श्वनाथचरित् से प्रतीत होता है कि उस समय तोमरों की राजधानी दिल्ली समृद्ध नगरी थी और तँवरराज अनंगपाल अपने शौर्य आदि गुणों के कारण सर्वत्र विख्यात था। द्वितीय अनंगपाल ने मेहरोली के लौह स्तंभ की दिल्ली में स्थापना की। शायद इसी राजा के समय तँवरों ने अपनी नीति बदली। बीसलदेव तृतीय न संवत् १२०८ (सन् ११५१ ईo) में तोमरों को हरा कर दिल्ली पर अधिकार कर लिया। इसके बाद तँवर चौहानों के सामंतों के रूप में दिल्ली में राज्य करते रहे।[कृपया उद्धरण जोड़ें] पृथ्वीराज चौहान की पराजय के बाद दिल्ली पर मुसलमानों का अधिकार हुआ।


दिल्ली के तोमर राजासंपादित करें

  1. अनंगपाल प्रथम 736 ई
  2. विशाल 752
  3. गंगेय 772
  4. पथ्वीमल 793
  5. जगदेव 812
  6. नरपाल 833
  7. उदयसंघ 848
  8. जयदास 863
  9. वाछाल 879
  10. पावक 901
  11. विहंगपाल 923
  12. तोलपाल 944
  13. गोपाल 965
  14. सुलाखन 983
  15. जसपाल 1009
  16. कंवरपाल 1025 (मसूद ने हांसी पर कुछ दिन कब्जा किया था 1038 में)
  17. अनंगपाल द्वितीय 1046 (1052 महरौली के लौह स्तंभ पर शिलालेख]])
  18. तेजपाल 1076
  19. महीपाल 1100
  20. दकतपाल (अर्कपाल भी कहा जाता है) 1115 A.D.-1046 (1052 महरौली के लौह स्तंभ पर शिलालेख)

सन्दर्भ 

  1.  Sociological Bulletin. Indian Sociological Society. 2004. पृ॰ 404.
  2.  B S Dahiya:Jats the Ancient Rulers (A clan study), p.244, s.n.239
  3.  Rahul Khari (5 January 2007). Jats and Gujars: origin, history and culture. Reference Press. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-8405-031-8. मूल से 2 जनवरी 2014 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 28 September2011In the contemporary Delhi, there are about 75 villages inhabited by the Gujars out of which 12 villages happened to be in Mehrauli where Gurjar belonging to Tomar clan dwell, who call themselves 'Tanwar'.
  4.  Rajputane ka Itihas ( History of Rajputana), Publisher: Vaidika Yantralaya, Ajmer 1927.
  5. books.google.es/books/about/Prithviraj_raso.html?id=4ymMbwAACAAJ&redir_esc=y
  • दशरथ शर्मा : दिल्ली का तोमर राज्य, राजस्थान भारती, भाग ३, अंक ३, ४, पृo १७२६

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